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alokmohan


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गुवाहाटी कांड

Posted On: 18 Jul, 2012  
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धर्म के नाम पर

Posted On: 3 Jan, 2012  
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भारत की संसद और उसकी गरिमा

Posted On: 30 Dec, 2011  
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भ्रष्टाचार के आम

Posted On: 30 Dec, 2011  
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माता नही कु -माता

Posted On: 29 Dec, 2011  
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आधुनिकता से उपेक्षित बुजुर्ग

Posted On: 28 Dec, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: alokmohan alokmohan

के द्वारा: alokmohan alokmohan

के द्वारा: alokmohan alokmohan

के द्वारा: satish3840 satish3840

के द्वारा: alokmohan alokmohan

@ मननीय शाही जी आपने कहा "जैसा कि आपने कहा आप ईश्वर विरोधी नहीं हैं, तो फ़िर हिन्दू धर्मावलम्बियों को ईश्वर की उपासना का कोई सही और अनुकरणीय तरीक़ा बता देते, तब शायद इस बहस की कोई आवश्यकता ही नहीं होती ।" तरीका तो कब से ये वेद और ये महान संत बताते चले आ रहे है आप शंकराचर्या ,दयानद ,गौतम बुध ,विवेकनद आदि ने जम कर बताया है आखिर कैसे इश्वर की उपसना करनी चाहिए "आपने खुद को चर्चित बनाने के महत्वाकांक्षी उन अनगिनत सिरफ़िरों की नक़ल मात्र की है, जो अक्सर हिन्दू सहिष्णुता का बेज़ा फ़ायदा उठाते हुए इस मंच अथवा हर कहीं जहां भी सुविधाजनक मौक़ा मिल जाय, अपना सतही ज्ञान बघारने से बाज़ नहीं आते" आप सही है मेरा वजूद कुछ भी नही है आखिर इतने उम्र के अनुभव के आगे मै कुछ भी नही क्यों मुझे समझ में नही आता ये मूर्तियों कब्रों और पेड़ पोधो की उपासना क्यों की जा रही है हमें बचपन से पाठय किया जाता है "जिसने सूरज चाँद बनाया जिसने सारा जगत बनाया | हम उस इश्वर के गुण गए " पता नही लोग क्यों दुसरे के गुण गा रहे है " मैं खुद हिन्दू कट्टरवाद में विश्वास नहीं रखता, लेकिन किसी भी धर्म के प्रति आस्था के माध्यमों पर कटाक्ष या बेवज़ह की टीका-टिप्पणी के खिलाफ़ अवश्य हूँ । मात्र इस आधार पर कि चूंकि मैं भी हिन्दू हूं, इसलिये मुझे स्वधर्म की नुक्ताचीनी करने का पूरा-पूरा अधिकार है, ओछी मानसिकता ही कहा जाएगा" मै हिन्दू कट्टरवादी हु मुझे अपने धर्म से बेहद लगाव है और मेरा ये भी मानना ये सबसे महान है आप के हिसाब से शंकराचर्या ,दयानद ,गौतम बुध ,विवेकनद आदि सब ओछी मानसिकता के वक्ती थे जिन्होंने ताकलिन पाठ पूजा और सामाजिक वाव्स्था का विरोध किया है "कोई व्यक्तिगत रूप से पूजा की कौन सी पद्धति अपनाता है, किस देवी-देवता का उपासक है, आस्तिक है या नास्तिक, यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है । परन्तु किसी धर्म-सम्प्रदाय में सामूहिक मान्यताप्राप्त धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला विचार हमेशा निन्दनीय होगा, चाहे उसके पीछे के तर्क़ कितने भी वज़नदार क्यों न हों ।" सबसे बड़ी बात तो यही है पीठी दर पीठी जिस चीज को मानते रहे है कोई बोल दे इसमें कुछ सुधार हो सकता है मन और बुधि कैसे मान ले फिर चाहे जितना पठे या चाहे जितनी उम्र हो

के द्वारा: alokmohan alokmohan

देखिये तुलसीदास जी इन देवी देवताओ के बारे में क्या कहते है इंद्रीं द्वार झरोखा नाना ।तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥ आवत देखहिं बिषय बयारी ।ते हठि देही कपाट उघारी ॥ इन्द्रियों के द्वारा हृदय रूपी घरके अनेकों झरोखे हैं वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखेपर) देवता थाना किये (अड्डा जमाकर) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको देखते हैं, त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।। शायद आप पर इन देवी देवतो ने जमकर कब्ज़ा कर रखा है इसलिए आप इस लेख का मतलब नही समझ पाए .मैंने इश्वर का विरोध नही किया है जब आप को ये देवी देवता छोड़ देगे तब आप को इश्वर समझ में आ जायेगा ,और तब आप अंधी आस्था और इन धर्म की दुकानों का विरोध करना सुरु कर देगे

के द्वारा: alokmohan alokmohan

महोदय, आप फ़िरंगियों से भी दो क़दम आगे हैं, जिन्होंने अपनी सत्ता को चिर-स्थाई बनाए रखने हेतु इस देश के इतिहास को अपने माफ़िक़ ढालने का षड्यंत्र रचा, और हमारे अधिकांश महापुरुषों को विलेन का दर्ज़ा दे डाला । आप तो हमारे भगवानों को ही झुठला कर पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं । वर्णन की शैली ऐसी, जैसे हर घटना के प्रत्यक्षदर्शी आप स्वयं रहे हों । गिरावट की भी कोई हद होती है । भगवान को किसी ने नहीं देखा, यह सत्य है । परन्तु आपकी सोच तो आस्था को ही सिरे से खारिज़ करती है, जिसके बिना मानव समाज अराजकता का शिकार होकर दिशाहीन हो सकता है । क्योंकि ईश्वर प्रदत्त बुद्धि के कारण इसी प्राणी को ईश्वर की अधिक आवश्यकता है, जानवरों को नहीं । यदि धर्म और आस्था का अनुशासन न हो, तो राजनीतिक सत्ता के क़ानून क्योंकर खुराफ़ाती मानव को नियंत्रित कर पाएंगे, जो खुद राजनीति के ग़ुलाम बन चुके हैं । सवाल यह नहीं है कि कब किस देवी-देवता की मान्यता को बढ़ावा दिया गया, बल्कि यह है कि इस बढ़ावे से समाज को लाभ क्या हुआ । इसके लिये गहन चिन्तन की आवश्यकता पड़ेगी, जो आप जैसे सतही विचार वाले व्यक्तियों के वश के बाहर की बात है । समाज की धार्मिक आस्थाओं में भी परम्पराओं की भांति ही समय की मांग के अनुसार आंशिक परिवर्तन अपेक्षित होते हैं । विकास-क्रम के साथ मनुष्य के सोच-विचार, आदतों और आवश्यकताओं में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । मैं तो टीवी के माध्यम से आज के भारतीय समाज को समय के अनुसार धार्मिक प्रवचन और दीक्षा देकर मंदिरों में जाने हेतु प्रेरित करने वाले धर्मगुरुओं और बाबाओं को साधुवाद ही देना चाहूंगा । उनके कारण आज समाज की आस्था में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है । इस आस्था-वृद्धि से यदि मन्दिरों की आय में वृद्धि हो रही है, तो मन्दिरों की सुविधाओं का भी तो विकास होगा ! हमारे मन्दिर भग्नावशेषों में तब्दील होते रहें, और शतप्रतिशत आस्थाविहीन जनसमुदाय मंदिरों की बजाय मयखानों की राह पकड़ ले, तो शायद शाम ढलने के बाद हमें अपने परिवारों को घर में अकेले छोड़कर कहीं जाने में भी भय लगने लगेगा । आपके नज़रिये से ये बाबा लोग अपनी दुकानदारियां चलाने वाले ढोंगी हो सकते हैं, परन्तु मैं ऐसा नहीं मानता । सकारात्मक सोच यह होगी, कि उनसे समाज को क्या मिल रहा है, इसका विश्लेषण हो । ज़रिया चाहे भगवान गणेश हों, शिवजी हों, शनि हों अथवा संतोषी माता, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता । जो माध्यम भी मनुष्य को आस्थावान बनाकर उसे स्वानुशासित बनाने में सक्षम है, वही पूज्य है । धन्यवाद !

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के द्वारा: alokmohan alokmohan

के द्वारा: alokmohan alokmohan

के द्वारा: संदीप कौशिक 'राही अंजान' संदीप कौशिक 'राही अंजान'




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